निर्जन पहाड़ों और झरणों से घिरे हुए वन में हनुमान जी राम नाम का जाप करते हुए तप कर रहे थे। तभी बाली पेड़ों को तिनकों की भांति उखाड़ते हुए हनुमान जी के पास आकर अहंकार भरे स्वर में चिल्लाकर बोलने लगा क्या इस संसार में कोई ऐसा है जो मुझसे युद्ध कर सके। अगर किसी ने अपनी मां का दूध पिया है तो सामने आकर मुझसे लड़े। हनुमान जी ने बहुत ही विनम्र स्वर में बाली के वीरता का सम्मान किया। पर बाली का अहंकार घटने वाला नहीं था। अंततः जब बाली ने कहा मैं तुम्हारे प्रभु श्री राम को भी हरा सकता हूं। तब श्री राम का अपमान हनुमान जी से सहा नहीं गया। हनुमान जी ने युद्ध की चुनौती स्वीकार कर ली। युद्ध का दिन भी निश्चित हो गया। हनुमान जी को ललकारना बाली की जिंदगी की शायद सबसे बड़ी भूल थी। आखिर बाली के इतने अहंकार का रहस्य क्या था? दरअसल बाली को उसके धर्मपिता इंद्र से एक दिव्य हार प्राप्त था।
यही दिव्य हार उसका असली अस्त्र था जो किसी की भी आधी शक्ति खींच सकता था। एक बार रावण ने सोचा मैंने तीनों लोक जीत लिए लेकिन अभी भी मनुष्य और वानरों के हाथों मृत्यु संभव है। इसलिए उसने सोचा कि क्यों ना वानर राज बाली को युद्ध में हरा दूं ताकि वानरों के हाथों मृत्यु का भय भी समाप्त हो जाए। इसलिए रावण ने बाली को युद्ध के लिए ललकारा। लेकिन युद्ध के दौरान बाली ने रावण को अपनी बाई कांख में दबाकर 6 महीने तक घुमाया। अंततः रावण ने बाली से क्षमा मांग ली और उसे मित्रता कर ली। रावण जैसे महाबली को हराने के बाद बाली का अहंकार चरम सीमा पर पहुंच गया। वह हर जगह घूम-घूम कर कहने लगा, “मुझसे युद्ध करने वाला इस संसार में कोई पैदा ही नहीं हुआ। मैं सर्वशक्तिमान हूं। रावण भी मेरे सामने तुच्छ है।
बाली हनुमान से क्यों भागा? हनुमान की अनकही शक्ति !
जब बाली का अहंकार सीमा से बाहर हो गया तब जांबवंत जी से रहा नहीं गया। उन्होंने बाली से कहा तुम जो स्वयं को सर्वशक्तिमान और अजय वीर समझ रहे हो यह तुम्हारा भ्रम है। तुम्हें भी धूल चटाने वाला इसी संसार में मौजूद है। बाली गरजते हुए बोला कौन है वह? बताइए मैं उसका भी अंत कर दूंगा। जांबवंत जी बोले हनुमान की शक्ति के सामने तुम कुछ भी नहीं हो। बाली उपहास करते हुए बोला क्या मजाक कर रहे हैं आप? वह हनुमान जो हमेशा गुफा में छिपकर राम नाम जपता रहता है। उसके पास भी कोई शक्ति है? शंख को यह सुनकर आश्चर्य हो रहा है। मैं तो उसे चुटकी में ही समाप्त कर सकता हूं। यह कहकर बाली पेड़ों को उखाड़ते हुए हनुमान जी को ढूंढने निकल पड़ा। कहां गया रामभक्त हनुमान? कहां छिपा बैठा है? एक बार मिल जाए उसकी जीवन लीला समाप्त करके ही किष्किंधा लौटूंगा। निर्जन वन में जहां सुंदर झरनों और पक्षियों की मधुर ध्वनि से वातावरण पवित्र था वहां हनुमान जी गहरी तपस्या में लीन थे।
अचानक बाली की गर्जना से वह शांत वातावरण बदल गया। पहले तो हनुमान जी ने अनसुना करने की कोशिश की। लेकिन जब बाली सामने आकर चिल्लाने लगा तब हनुमान जी ने धीरे-धीरे आंखें खोली और शांत स्वर में कहा हे वानर निसंदेह आप महाशक्तिशाली और अजय वीर हैं। आप देवराज इंद्र के पुत्र और किष्किंधा के अधिपति हैं। आपको परास्त करने वाला इस धरती पर कोई पैदा नहीं हुआ। लेकिन इस शांत वन और निर्दोष वृक्षों पर अपनी शक्ति का प्रदर्शन क्यों कर रहे हैं? यह सुनकर भी बाली का अहंकार कम नहीं हुआ बल्कि और बढ़ गया। वह अपमानजनक स्वर में बोला, तू तुच्छ वानर मुझे ज्ञान दे रहा है। मैं तुम्हारा ज्ञान सुनने नहीं आया। अगर मुझसे लड़ने की हिम्मत है तो लड़ो नहीं तो मरने के लिए तैयार हो जाओ। हनुमान जी ने फिर कहा, हे बाली, शांत हो जाइए। लेकिन बाली ने सारी सीमाएं पार करते हुए कहा, मैं तुम्हारे प्रभु श्री राम को भी धूल चटा सकता हूं।
अब तक शांत रहने वाले हनुमान जी अपने प्रभु श्री राम के अपमान से क्रोध की अग्नि में जल उठे। जय बजरंगी जय जय हनुमान। हनुमान जी अपनी विशाल गदा उठाई और बाली की चुनौती स्वीकार कर ली। निश्चित हुआ कि अगले दिन सुबह दोनों के बीच युद्ध होगा। हनुमान जी आश्रम लौट आए। बाली भी यह सोच कर लौट गया कि वह हनुमान जैसे साधारण तपस्वी को आसानी से हरा देगा। लेकिन उसे जरा भी अंदाजा नहीं था। जिस हनुमान को वह साधारण समझ रहा था वह कोई साधारण वानर नहीं। वह थे स्वयं भगवान शिव के अंशावतार पवन पुत्र हनुमान। हनुमान जी जैसे ही आश्रम लौटे, परमपिता ब्रह्मा उनके सामने प्रकट हुए। उन्होंने हनुमान जी को समझाने का प्रयास किया कि वे बाली से युद्ध ना करें। लेकिन हनुमान जी ने कहा यदि उसने केवल मेरा अपमान किया होता तो कोई बात नहीं थी। लेकिन उसने मेरे प्रभु श्री राम का अपमान किया है। अब उसे सबक सिखाना ही होगा।
तब ब्रह्मा जी ने एक अद्भुत सुझाव दिया। ठीक है हनुमान तुम युद्ध के लिए जाओ। लेकिन अपनी कुल शक्ति का केवल दवां हिस्सा ही प्रयोग करना। बाकी शक्ति अपने आराध्य के चरणों में समर्पित कर दो। युद्ध के बाद तुम वह शक्ति पुनः प्राप्त कर सकते हो। क्योंकि यदि तुम पूर्ण शक्ति के साथ बाली से युद्ध करोगे तो वह तुम्हारे तेज से ही भस्म हो जाएगा और इससे श्री राम की भविष्य की लीला में बाधा आ जाएगी। हनुमान जी ने सहमति जताई। अगले दिन हनुमान जी मात्र 10% शक्ति लेकर युद्ध भूमि में पहुंचे। जब हनुमान जी और बाली आमने-सामने आए पूरा रणक्षेत्र कांप उठा। जैसे ही हनुमान जी की दृष्टि बाली पर पड़ी बाली के गले का दिव्य हार सक्रिय हो गया। उसने हनुमान जी की 10% शक्ति का आधा यानी कुल 5% शक्ति अपने अंदर खींच ली और उसी क्षण रणभूमि की हवा तक थम गई। शक्ति के संचार से बाली के शरीर में बिजली सी दौड़ गई। उसे लगा जैसे शक्ति का सागर उसके भीतर उमड़ पड़ा हो। उसका शरीर गुब्बारे की तरह फूलने लगा। उसकी रगों में इतना तेज प्रवाह होने लगा कि लगा अभी फट जाएगा।
तभी ब्रह्मा जी प्रकट हुए और बोले यदि जीवित रहना है तो तुरंत यहां से भागो। हजार योजन दूर जाकर ही तुम्हें राहत मिलेगी। बाली भयभीत होकर भागने लगा। भागता रहा। बहुत दूर पहुंचने के बाद ही उसे कुछ हल्का महसूस हुआ। तभी ब्रह्मा जी फिर उसके सामने प्रकट हुए और बोले हे बाली तुम स्वयं को संसार में सबसे शक्तिशाली समझते हो। लेकिन तुम्हारा शरीर हनुमान की शक्ति का एक छोटा सा अंश भी सहन नहीं कर पाया। हनुमान केवल 10% शक्ति लेकर आए थे। और तुम्हारे वरदान के कारण उसकी भी आधी यानी 5% शक्ति ही तुम्हारे शरीर में आई और तुम उसे भी सहन नहीं कर पाए। सोचो यदि हनुमान अपनी संपूर्ण शक्ति के साथ आते तो तुम्हारा क्या होता? यह सुनकर बाली की आंखों से अहंकार का पर्दा हट गया। वह तुरंत हनुमान जी के चरणों में गिर पड़ा और बोला हे हनुमान जी आप इतने शक्तिशाली होकर भी कितने विनम्र हैं। हर समय प्रभु का नाम जपते हैं और मैं एक मूर्ख थोड़ी सी शक्ति पाकर कितना अहंकारी बन गया था। मुझे क्षमा करें। बाली के शब्दों में अब अहंकार नहीं बल्कि पश्चाताप था। हनुमान जी ने उसे उठाया और अत्यंत करुणा भरे स्वर में कहा हे बाली शक्ति का अर्थ दूसरों को दबाना नहीं होता बल्कि अपनी शक्ति को नियंत्रित करना ही सच्ची वीरता है।