कैसे आएगा महाप्रलय ? श्रीमद्भागवत के अनुसार जानिए!

जिस सूर्य से जीवन मिलता है वही सूर्य एक दिन मृत्यु बन जाएगा। समुद्र उबलेंगे। धरती जल जाएगी। देवता भी भय से कांप उठेंगे। और समय स्वयं समय भी समाप्त हो जाएगा। हजारों वर्ष पहले श्रीमद् भागवत महापुराण ने बताया था महाप्रलय। वो समय जब पूरा ब्रह्मांड भगवान में विलीन हो जाता है। पहला है नित्य प्रलय हर क्षण होने वाला विनाश जन्म। मृत्यु हर पल पुरानी कोशिकाएं मरती हैं। हर दिन कुछ समाप्त होता है। दूसरा है नैमितिक प्रलय। जब ब्रह्मा का एक दिन समाप्त होता है तब तीनों लोक नष्ट हो जाते हैं। भगवान नारायण योग निद्रा में चले जाते हैं। तीसरा सबसे भयानक प्राकृतिक प्रलय महाप्रलय जब स्वयं ब्रह्मा का जीवन समाप्त हो जाता है और संपूर्ण सृष्टि मिट जाती है। चौथा है आत्यंतिक प्रलय जब जीव का अहंकार समाप्त हो जाता है और आत्मा परमात्मा में लीन हो जाती है।

महाप्रलय की शुरुआत होती है 100 वर्षों के भयानक सूखे से। बारिश की एक बूंद नहीं गिरती। नदियां मर जाती हैं। समुद्र सिकुड़ने लगते हैं। धरती पर अकाल छा जाता है। भूख इतनी भयानक हो जाती है कि मनुष्य एक दूसरे को खाने लगते हैं। फिर आकाश में प्रकट होते हैं। सात प्रचंड सूर्य उनकी ज्वाला इतनी भयानक होती है कि समुद्र उबलने लगते हैं। सूर्य पृथ्वी का सारा जल पी जाता है। नदियां महासागर यहां तक कि जीवो के शरीर का रस भी फिर प्रकट होती है। संवर्तक अग्नि अनंत शेष के मुख से ये अग्नि पाताल से उठती है और पूरा ब्रह्मांड जलने लगता है। पहाड़ मोम की तरह पिघल जाते हैं। धरती अंगार बन जाती है। प्रलय के समय भगवान शिव रुद्र रूप धारण करते हैं। उनकी तांडव ऊर्जा से विनाश की गति और भी तीव्र हो जाती है। देवता भयभीत होकर भगवान की शरण लेते हैं। इसके बाद सैकड़ों वर्षों तक प्रचंड तूफान चलते हैं। पूरा आकाश धूल और धुएं से भर जाता है। सूर्य और चंद्रमा दिखाई देना बंद हो जाते हैं। फिर उत्पन्न होते हैं संवर्तक मेघ। इतने विशाल कि पूरा ब्रह्मांड अंधकार में डूब जाता है। उनकी गर्जना से दिशाएं कांप उठती हैं। और फिर सैकड़ों वर्षों तक लगातार वर्षा होती है। धीरे धीरे संपूर्ण पृथ्वी जल में डूब जाती है। पर्वत वन देवलोक सब समाप्त हो जाते हैं। पूरा ब्रह्मांड एक अनंत महासागर बन जाता है। जब संपूर्ण सृष्टि समाप्त हो जाती है। तब केवल भगवान नारायण शेष रहते हैं। वे अनंत शेषनाग पर क्षीर सागर में योग निद्रा धारण करते हैं। सारी सृष्टि उन्हीं में लीन हो जाती है। अब प्रारंभ होता है तत्वों का विनाश पृथ्वी जल में विलीन होती है। जल अग्नि में अग्नि वायु में वायु आकाश में आकाश अहंकार में और अंत में प्रकृति भी परमात्मा में विलीन हो जाती है। श्रीमद् भागवत कहता है जो उत्पन्न हुआ है उसका विनाश निश्चित है। साम्राज्य समाप्त होंगे। सभ्यताएं मिट जाएंगी। यहां तक कि ब्रह्मांड भी। लेकिन परम सत्य कभी नष्ट नहीं होता। महाप्रलय हमें याद दिलाता है कि इस संसार में कुछ भी स्थाई नहीं है। सिवाय भगवान के। एक दिन समय रुक जाएगा, तारे बुझ जाएंगे और ब्रह्मांड समाप्त हो जाएगा। लेकिन भगवान शाश्वत हैं।

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