रावण मर चुका था। लंका की जमीन पर उसका बड़ा साया शांत पड़ा था। उसके सारे दस सिर अब खामोश थे। 20 हाथ अब किसी से टक्कर नहीं ले रहे थे। आसमान से देवता फूल बरसा रहे थे। वानर सेना जीत का जश्न मना रही थी। लेकिन उसी समय ब्रह्मांड में एक सवाल गूंजा, जिसका जवाब आज भी लाखों लोग जानना चाहते हैं। रावण की मौत के बाद उसकी आत्मा क्या बनी? क्या वो नरक गया? क्या उसे स्वर्ग मिला? या फिर उसे ऐसा कोई जगह मिली, जिसकी सोच भी कोई नहीं सकता। आज की कहानी आपको युद्ध के मैदान से लेकर यमलोक, देवलोक और विष्णु लोक तक ले जाएगी।
रावण की मृत्यु के बाद उसकी आत्मा कहाँ गई? What Happened To Ravana After Death !!
एक ज़बरदस्त सफ़र होने वाला था। त्रेता युग का सबसे खतरनाक लड़ाई अपने आखिरी पड़ाव पर था। एक तरफ थे मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम। दूसरी तरफ था तीनों दुनियाओं को हिलाने वाला लंकापति रावण। रावण के पास अनगिनत दिव्य हथियार थे। उसका शरीर वरदानों से पूरी तरह से सुरक्षित था। देवता, दानव और गंधर्व तक उससे डरते थे। लेकिन उस दिन वक्त बदल चुका था। विभीषण ने भगवान राम को रावण की सबसे बड़ी कमजोरी बता दी थी। उसकी नाभि में अमृत का राज छुपा था। भगवान राम ने अपनी आंखें बंद कीं, महादेव और अपने गुरुओं को याद किया। फिर उन्होंने अपने धनुष पर ब्रह्मास्त्र चढ़ाया। जैसे ही बाण छोड़ा गया, पूरा आसमान रोशनी से भर गया। बाण सीधे रावण की नाभि में लगा। जोरदार गर्जना हुई। रावण लड़खड़ा गया। उसकी आंखों के सामने उसका पूरा जीवन घूम गया। फिर महान लंकापति ज़मीन पर गिर पड़ा। जैसे ही रावण की आखिरी सांस निकली, कुछ अजीब सा हुआ। उसके शरीर से एक दिव्य रोशनी निकलने लगी। ये कोई आम रोशनी नहीं थी, ये उसकी आत्मा थी। रावण की आत्मा धीरे-धीरे ऊपर उठने लगी। उसी वक्त ब्रह्मांड के अलग-अलग लोकों में हलचल मच गई। यमलोक में यमदूत तैयार हो गए। स्वर्ग लोक में देवता इकट्ठा होने लगे। कैलाश पर्वत पर भगवान शिव चुप हो गए और वैष्णु भगवान मुस्कुरा उठे क्योंकि सब जानते थे ये कोई आम आत्मा नहीं है। यमराज के दरबार में मीटिंग बुलाई गई। यमदूत बोले, “महाराज, रावण ने माता सीता का हरण किया था, उसने अधर्म किया है। उसे तो सजा मिलनी चाहिए।” दूसरे यमदूत बोले, “पर वो बहुत बड़ा ज्ञानी भी था, उसने सालों की तपस्या की थी।” चर्चाएँ शुरू हो गईं। कोई कह रहा था कि वो पापी है, कोई कह रहा था कि वो महान विद्वान था, किसी को उसका घमंड दिख रहा था, किसी को उसकी शिव भक्ति।
यमराज खुद भी सोच में पड़ गए। इतिहास में पहली बार…ऐसा पहली बार हुआ था कि किसी आत्मा का फैसला इतना मुश्किल हो गया। तभी ब्रह्मा जी वहां आ पहुंचे। उन्होंने कहा, “तुम सब रावण को सिर्फ राक्षस समझ रहे हो, लेकिन उसकी पूरी कहानी इससे कहीं बड़ी है।” सभी हैरान रह गए। ब्रह्मा जी ने बताया कि रावण जन्म से राक्षस नहीं था। वो महान ऋषि विश्रवा का बेटा था। उसने वेद पढ़े थे। वो संगीत, ज्योतिष, राजनीति और युद्ध कला में बहुत माहिर था। रावण इतना ज्ञानी था कि देवता भी उसके ज्ञान की कदर करते थे। लेकिन एक गलती ने उसे बर्बाद कर दिया। वो गलती थी उसका बड़ा अहंकार। ब्रह्मा जी ने सभा को एक और रहस्य बताया। एक समय ऐसा था जब रावण ने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए कठोर तपस्या की थी। वर्षों तक तप करने के बाद भी जब शिव प्रकट नहीं हुए तो रावण ने अपना एक सिर काटकर अर्पित कर दिया। फिर दूसरा फिर तीसरा ऐसे करते-करते उसने नौ सिर काट दिए। जब वो दसवां सिर काटने जा रहा था। तभी भगवान शिव प्रकट हो गए। महादेव उसकी भक्ति से प्रसन्न हो गए।
उन्होंने उसके सभी सिर वापस लौटा दिए और उसे अपार शक्तियां प्रदान की। सभा में सन्नाटा छा गया। अब प्रश्न और कठिन हो गया था। इतनी महान भक्ति करने वाले व्यक्ति को नरक कैसे भेजा जाए? उधर युद्ध भूमि में भगवान राम रावण के शरीर के पास खड़े थे। उन्होंने लक्ष्मण से कहा जाओ रावण से अंतिम ज्ञान प्राप्त करो। लक्ष्मण आश्चर्यचकित रह गए। उन्होंने कहा प्रभु वह हमारा शत्रु था। राम मुस्कुराए। शत्रु होने से उसका ज्ञान छोटा नहीं हो जाता। लक्ष्मण रावण के पास पहुंचे। रावण ने उन्हें जीवन की सबसे बड़ी सीख दी। उसने कहा लक्ष्मण मैंने अपने जीवन में एक बड़ी भूल की। जो अच्छे कार्य तुरंत करने चाहिए थे उन्हें टालता रहा। और जिन बुरे कार्यों से बचना चाहिए था उन्हें कर बैठा। आज मेरा पतन उसी का परिणाम है। लक्ष्मण मौन रह गए। उन्हें समझ आ गया कि मृत्यु के क्षण में भी रावण ज्ञान बांट रहा था। तभी नारद मुनि सभा में पहुंचे। उन्होंने कहा तुम सब एक बहुत बड़ा रहस्य भूल रहे हो। सभी उनकी ओर देखने लगे। नारद बोले रावण वास्तव में कोई साधारण जीव नहीं था। वो भगवान विष्णु के द्वारपालों में से एक था। उसका वास्तविक नाम जय और विजय की कथा से जुड़ा था। ऋषियों के श्राप के कारण उन्हें पृथ्वी पर जन्म लेना पड़ा। पहले जन्म में वे हिरण्याक्ष और हिरण्यकश्यपु बने। दूसरे जन्म में रावण और कुंभकर्ण। तीसरे जन्म में शिशुपाल और दंतवक्र और हर जन्म में भगवान विष्णु ने स्वयं उनका वध किया। अब सब कुछ स्पष्ट होने लगा।
रावण की आत्मा यमलोक की ओर नहीं जा रही थी। वो एक दिव्य प्रकाश के रूप में ऊपर उठ रही थी। देवता उसे देख रहे थे। ऋषि उसे देख रहे थे। यमराज भी उसे देख रहे थे। धीरे-धीरे वो प्रकाश वैुंठ की दिशा में बढ़ने लगा। क्योंकि उसका श्राप समाप्त हो चुका था। उसका पृथ्वी पर जन्म लेने का उद्देश्य पूरा हो चुका था। आज भी दशहरे पर रावण का पुतला जलाया जाता है। लेकिन वास्तव में हम रावण को नहीं जलाते। हम अपने भीतर छिपे अहंकार को जलाने का संदेश देते हैं। क्योंकि इतिहास गवाह है। ज्ञान के बिना शक्ति खतरनाक है। भक्ति के बिना विनम्रता अधूरी है और अहंकार के साथ महानता भी टिक नहीं सकती। यही रावण की मृत्यु और उसकी आत्मा की सबसे बड़ी कहानी है। जय श्री राम। जय श्री राम। जय श्री राम।