जरा सोचिए एक लड़के ने अपना दाया अंगूठा काट दिया। अपने गुरु के सामने रख दिया और जानते हैं गुरु ने क्या किया? उन्होंने मुस्कुराते हुए उसे स्वीकार कर लिया। आज के इस विश्लेषण में हम इसी दिलचस्प सो मटेरियल पर बात कर रहे हैं जो इतिहास के सबसे महान मगर शायद सबसे उपेक्षित धनुर्धर की कहानी खोलता है। एक ऐसी कहानी जिसे इतिहास ने कभी वह सम्मान नहीं दिया जिसकी वो असल में हकदार थी। तो चलिए थोड़ा पीछे चलते हैं।
एकलव्य ने अँगूठा क्यों काटा? वो सच जो महाभारत में छुपाया गया |
द्वापर युग में यह महाभारत का समय था। हस्तिनापुर के घने जंगलों से बस थोड़ी ही दूर निषाद राज हिरण्यधनु के घर एक बालक का जन्म होता है और उसका नाम रखा जाता है एकलव्य। अब देखिए उस समय के समाज में निषाद जाति को काफी निम्न माना जाता था। उन्हें अक्सर हास्य पर रखा जाता था। लेकिन अगर आप उस बालक की आंखों में देख लेते ना तो वहां जो चमक थी वो किसी भी राजघराने के राजकुमार से बिल्कुल कम नहीं थी। उसके अंदर एक गजब की आग थी। बचपन से ही एकलव्य को धनुर विद्या का ऐसा जुनून था कि देखने वाले भी हैरान रह जाते थे। जंगल की सूखी टहनियां ही उसका धनुष बन गई और पत्थर उसके तीर और उसका विज़न बिल्कुल क्लियर था। उसका बस एक ही सपना था भारत का सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर बनना। उन दिनों एकलव्य के कानों में बस एक ही नाम गूंजता था। गुरु द्रोणाचार्य पांडवों और कौरवों के महान गुरु। एकलव्य ने ठान लिया कि भाई सीखना है तो बस इन्हीं से सीखना है। अब आता है वह दिन जब वह हस्तिनापुर पहुंचा। द्रोणाचार्य के सामने पूरे आदर के साथ झुका। लेकिन द्रोणाचार्य का जो जवाब था उसने एकलव्य की पूरी दुनिया ही हिला दी। उन्होंने साफ कह दिया मैं केवल क्षत्रियों को शिक्षा देता हूं। तुम निषाद हो। यहां तुम्हारे लिए कोई स्थान नहीं है। जरा सोचिए उस बच्चे पर क्या बीती होगी? उसे सिर्फ इसलिए रिजेक्ट कर दिया गया क्योंकि वह एक खास जाति से था। तो क्या उसका सपना वहीं खत्म हो गया? कोई और होता तो शायद उसी पल टूट जाता। लेकिन एकलव्य बिल्कुल नहीं। वह वापस जंगल लौट गया। हार मानकर नहीं बल्कि एक अटल संकल्प लेकर उसने क्या किया कि जंगल की मिट्टी से गुरु द्रोणाचार्य की एक मूर्ति बना दी। उसी को अपना गुरु मान लिया और फिर शुरू हुई उसकी तपस्या। अकेले बिना किसी गुरु के बिना किसी राजसी सुविधा के दिन रात बारिश हो या कड़कती धूप वो बस अभ्यास करता रहा। दिन बीते, महीने बीते, साल गुजर गए और धीरे-धीरे उसका निशाना वहां पहुंच गया जहां शायद किसी और की सोच भी नहीं जा सकती थी।
फिर आता है इस कहानी का टर्निंग पॉइंट। एक दिन द्रोणाचार्य और पांडव उसी जंगल से गुजर रहे थे। उनके साथ एक कुत्ता भी था जो भौकता हुआ थोड़ा आगे निकल गया। और अचानक कुत्ते के भौकने की आवाज बिल्कुल बंद हो गई। जब पांडवों ने जाकर देखा तो वह एकदम सन रह गए। कुत्ते का मुंह ठीक सात तीरों से इस तरह बंद किया गया था कि उसे एक खरोच तक नहीं आई थी। यह सटीकता कमाल की थी। द्रोणाचार्य ने जब वह कारीगरी देखी तो वह भी स्तब्ध रह गए। अब इस कारीगरी को देखकर अर्जुन की बेचैनी देखने लायक थी। उसने तुरंत पूछा गुरुदेव आपने तो वादा किया था कि मैं दुनिया का सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर रहूंगा। तो फिर यह कौन है जो मुझसे भी महान है? यहां टेंशन एकदम पीक पर थी। द्रोणाचार्य अब एक अजीब से धर्म संकट में फंस गए थे। एक तरफ इस बालक की अद्भुत प्रतिभा थी और दूसरी तरफ अर्जुन को दिया हुआ अपना वचन। काफी सोचने के बाद द्रोणाचार्य ने भारी मन से वो मांग लिया जो शायद किसी गुरु ने कभी नहीं मांगा। उन्होंने कहा एकलव्य तुमने मुझे गुरु माना है ना। तो तुम्हें गुरु दक्षिणा भी देनी होगी। और जानते हैं एकलव्य का रिएक्शन क्या था? बिना एक सेकंड लगाए पूरी श्रद्धा के साथ उसने जवाब दिया गुरुदेव जो मांगे आपका यह शिष्य पूरी तरह तैयार है। यह अपने आप में उस गुरु के प्रति उसकी अटूट भक्ति दिखाता है जिसने उसे कभी अपनाया ही नहीं था। और फिर गुरु के मुंह से वह शब्द निकले अपने दाहिने हाथ का अंगूठा।
जी हां, बस यह तीन शब्द इन तीन शब्दों ने एक ही पल में उस महान धनुर्धर की पूरी जिंदगी का रास्ता ही पलट कर रख दिया। अब आप और हम होते तो शायद पीछे हट जाते। लेकिन एकलव्य ने एक पल के लिए भी नहीं सोचा। उसने बिना किसी हिचकिचाहट के अपनी तलवार निकाली। अपना अंगूठा काटा और गुरु के चरणों में रख दिया। वो भी कैसे? चेहरे पर एक मुस्कान के साथ। उस भयंकर दर्द में भी वह मुस्कुरा रहा था। आज जब इतिहासकार इस घटना का विश्लेषण करते हैं, तो हमें अलग-अलग नजरिया देखने को मिलता है। कुछ इसे गुरु भक्ति का सबसे बड़ा उदाहरण मानते हैं। वह दूसरे लोग इसे सीधा-सीधा अन्याय और उस समय की व्यवस्था की क्रूरता कहते हैं। खैर, आप इसे जो भी नाम दें, एक बात तो तय है। जो इंसान इतने दर्द में भी मुस्कुरा सकता है, वह कोई साधारण इंसान तो बिल्कुल नहीं हो सकता। तो, क्या एकलव्य के साथ अन्याय हुआ? हमारे सोर्स मटेरियल के अनुसार इसका जवाब है हां निर्विवाद रूप से। एक बेहद प्रतिभाशाली बालक को सिर्फ उसकी जाति के आधार पर शिक्षा देने से मना कर दिया गया और जब उसने खुद के दम पर खुद को साबित किया तो उसी व्यवस्था ने डरकर उसकी वह प्रतिभा ही उससे छीन ली। लेकिन रुकिए कहानी यहां खत्म नहीं होती। अंगूठा कटने के बाद भी एकलव्य ने हार नहीं मानी। उसने धनुर विद्या नहीं छोड़ी। कहते हैं कि उसने अपनी बाकी उंगलियों का इस्तेमाल करके एक बिल्कुल नई विद्या विकसित कर ली जो पहले कभी थी ही नहीं। व्यवस्था ने उसे तोड़ने की पूरी कोशिश की लेकिन वह टूटा नहीं क्योंकि असली प्रतिभा किसी अंगूठे या शरीर के हिस्से में नहीं होती। वह होती है आपके दिमाग और आपके अदम्य साहस में। अगर हम इसे आज के संदर्भ में देखें तो एकलव्य की कहानी सिर्फ एक पौराणिक कथा भर नहीं है।
यह समाज के लिए एक आईना है। यह दिखाती है कि कैसे सिस्टम अक्सर टैलेंट से ज्यादा सोशल स्टेटस को अहमियत देते हैं और साथ ही यह उन सभी के लिए एक बहुत बड़ी प्रेरणा है जिन्हें कभी किसी ने यह कहकर रिजेक्ट किया हो कि यहां तुम्हारे लिए कोई जगह नहीं है। जरा इस बात पर गौर कीजिएगा। द्रोणाचार्य के इनकार के वक्त एकलव्य को कोई नहीं जानता था। लेकिन आज हजारों साल बाद क्या स्थिति है? द्रोणाचार्य को लोग अक्सर उनके राजसी शिष्यों की वजह से याद करते हैं। लेकिन एकलव्य एकलव्य को उसकी अपनी मेहनत और उसके अपने नाम से जाना जाता है। उसकी अपनी पहचान आज भी जिंदा है। तो आज का यह एक्सप्लेनर हमें एक बहुत ही पावरफुल सवाल के साथ छोड़ जाता है। क्या कोई भी व्यवस्था, कोई भी सिस्टम सच्ची प्रतिभा को हमेशा के लिए दबा सकता है। एकलव्य की यह कभी ना हार मानने वाली स्पिरिट ही अपने आप में इस सवाल का सबसे बड़ा और शानदार जवाब है।