गरुड़, सत्यभामा और सुदर्शन चक्र का घमंड कैसे टुटा? Krishna Hanuman Leela

आखिर कौन था वो जिसने भगवान विष्णु के सुदर्शन चक्र, उनके वाहन गरुड़ और उनकी पत्नी सत्यभामा तीनों का घमंड एक साथ चकनाचूर कर दिया। आज की कहानी उस महासंग्राम की है जब गरुड़ की रफ्तार, सुदर्शन की आग और सत्यभामा की खूबसूरती तीनों एक साथ एक साधारण से वानर के सामने घुटने टेकने पर मजबूर हो गए। द्वारका नगरी सोने की वो नगरी जो समुद्र के बीचों-बीच किसी तैरते हुए द्वीप की तरह चमक रही थी। बाहर से देखने पर सब कुछ शांत, भव्य और पवित्र था। लेकिन उस रात द्वारका की हवा में कुछ भारीपन था। एक अजीब सा सन्नाटा था। यह सन्नाटा था अहंकार का।

सबसे पहले चलते हैं द्वारका के उस हिस्से में जहां परिंदा भी पर नहीं मार सकता। शस्त्रागार। वहां एक मखमली आसन पर विराजमान था सुदर्शन चक्र। यह कोई साधारण हथियार नहीं था। इसका निर्माण स्वयं भगवान शिव ने किया था और सृष्टि की रक्षा के लिए भगवान विष्णु को सौंपा था। कहते हैं कि इसमें कोटि-कोटि सूर्यों का तेज समाया हुआ है। लेकिन आज सुदर्शन चक्र केवल एक धातु का गोला नहीं था। वो एक जीवित शक्ति बन चुका था। और उस रात वो अपनी ही दीप्ति, अपनी ही चमक को निहार रहा था। सुदर्शन के भीतर एक विचार ने जन्म ले लिया था। एक विषैला विचार। वो मन ही मन अपनी धुरी पर घूमते हुए सोच रहा था। यह तीनों लोग कृष्ण की पूजा क्यों करते हैं? क्या उस बांसुरी की वजह से? नहीं। वे डरते हैं तो मुझसे। अगर मैं ना हूं तो कृष्ण केवल एक ग्वाला है। यह मेरी शक्ति है जो उन्हें जगदीश्वर बनाती है। मैं ही हूं जो धर्म की रक्षा करता हूं। मैं अजय हूं। मेरे सामने काल भी सिर झुकाता है। सुदर्शन की वो गुनगुनाहट, वो वाइब्रेशन उस कमरे में गूंज रही थी। उसे यह भ्रम हो गया था कि वह भगवान का सेवक नहीं बल्कि भगवान की शक्ति का स्रोत है। उधर शस्त्रागार से कुछ दूर महलों के भीतर रनिवास में एक अलग ही लीला चल रही थी। यह कक्ष था रानी सत्यभामा का। दर्पणों से सजे इस कक्ष में रानी सत्यभामा अपने श्रृंगार में व्यस्त थी। सत्राजित की पुत्री और श्यमंतक मणि के ऐश्वर्य के साथ पली बढ़ी सत्यभामा को अपनी सुंदरता पर अभिमान नहीं बल्कि घमंड था। वो दर्पण में अपने प्रतिबिंब को देख रही थी। माथे पर बिंदी सजाते हुए उनकी नजर अपनी ही आंखों में अटक गई। उन्हें लगा कि विधाता ने आज तक उनसे सुंदर स्त्री की रचना ही नहीं की है। उनकी सोच धीरे-धीरे मर्यादा की सीमाओं को लांघने लगी। मन में तुलना शुरू हो गई। पहले रुक्मणी से फिर अन्य रानियों से और फिर उनका अहंकार काल की सीमाओं को चीरता हुआ त्रेता युग तक पहुंच गया। सत्यभामा ने अपने बालों में फूल लगाते हुए दर्पण से कहा, लोग सीता के सौंदर्य की इतनी गाथा क्यों गाते हैं? त्याग और तपस्या की बातें छोड़ो। अगर सौंदर्य की बात हो तो मैं क्या कम हूं? और फिर उनके मुख से वह वाक्य निकला जिसने उस पवित्र महल की दीवारों को भी कंपा दिया। वह अपनी सखी से नहीं अपने आप से कह रही थी। सुनो अगर त्रेता युग में प्रभु राम ने मुझे एक बार देख लिया होता तो शायद शायद वे सीता को भूल जाते। मेरा रूप ही ऐसा है कि मर्यादा पुरुषोत्तम का भी मन डोल जाए।

यह केवल एक वाक्य नहीं था। यह पतन की शुरुआत थी। एक भक्त का भगवान की पत्नी से ईर्ष्या करना और खुद को उनसे श्रेष्ठ मानना यह विनाश का संकेत था। और अहंकार की यह काली छाया केवल धरती पर नहीं थी। यह आकाश में भी फैल चुकी थी। द्वारका के ऊपर बादलों को चीरता हुआ एक विशाल पक्षी उड़ रहा था। पक्षीराज गरुड़ भगवान विष्णु का वाहन उनके पंखों की फड़फड़ाहट से हवा में बवंडर बन रहे थे। गरुड़ को अपनी गति का नशा था। वे आकाश में कलाबाजियां खाते हुए सोच रहे थे इस ब्रह्मांड में मुझसे तीव्र कोई नहीं। जब नारायण को बैकुंठ से धरती पर आना होता है तो मेरी जरूरत पड़ती है। जब उन्हें किसी असुर का पीछा करना होता है तो मेरी गति ही उनके काम आती है। मैं केवल वाहन नहीं हूं। मैं भगवान की गति हूं। मेरे बिना तो ईश्वर भी अधूरे हैं। द्वारका के इन तीन कोनों में शस्त्रागार में सुदर्शन, महल में सत्यभामा और आकाश में गरुड़ तीनों के मन में मैं का शोर इतना ज्यादा था कि उन्हें हम और हरी सुनाई ही नहीं दे रहे थे। अहंकार का एक अदृश्य काला धुआं द्वारका को घेर रहा था। बाहर सब सोना था लेकिन अंदर सब राख हो रहा था। लेकिन महलों के सबसे भीतरी कक्ष में द्वारकाधीश श्री कृष्ण अपनी शैया पर लेटे हुए थे। वे अंतर्यामी है। वे जगत के शोर को अनसुना कर सकते हैं। लेकिन अपने भक्त के मन में पनप रहे अहंकार की आहट को वे सबसे पहले सुन लेते हैं। उनके चेहरे पर वो चिर परिचित मुस्कान थी।

लेकिन आंखों में एक गहरी चिंता और करुणा भी थी। वे जानते थे कि असुरों से लड़ना आसान है। उनके लिए सुदर्शन काफी है। पापियों से लड़ना आसान है। उनके लिए गरुड़ की गति काफी है। लेकिन जब अपना ही भक्त अपना ही प्रिय अहंकार के अंधेरे में खोने लगे तो उससे लड़ना सबसे कठिन होता है। कृष्ण ने मन ही मन सोचा भक्त का सबसे बड़ा शत्रु कोई बाहरी दानव नहीं उसका अपना मैं होता है। सत्यभामा, गरुड़ और सुदर्शन यह तीनों मेरे अत्यंत प्रिय हैं। और प्रेम का तकाजा यही है कि मैं इन्हें गिरने ना दूं। आज मुझे अपने ही अस्त्रों और अपनों के विरुद्ध एक सर्जिकल स्ट्राइक करनी होगी। एक ऐसी लीला रचनी होगी जहां इनका घमंड चकनाचूर हो जाए ताकि यह फिर से शुद्ध हो सके। कृष्ण ने अपनी उंगलियों की एक हल्की सी मुद्रा बनाई और मानसिक संदेश भेजा। गरुड़ को क्षण भर में हवा के झोंके के साथ गरुड़ राजमहल की खिड़की पर आ विराजे। उनका सीना गर्व से फूला हुआ था।

उन्होंने मनुष्य रूप धारण किया और हाथ जोड़कर खड़े हो गए। आज्ञा प्रभु कहिए किस असुर का वध करने चलना है या तीनों लोकों में कहीं यात्रा करनी है? मेरी पीठ तैयार है। कृष्ण ने गरुड़ की आंखों में उस गर्व को देखा। उन्होंने बहुत ही शांत स्वर में कहा, नहीं गरुड़ आज कोई युद्ध नहीं है। आज मुझे अपने एक पुराने भक्त की याद आ रही है। बहुत समय हो गया उससे मिले हुए। गरुड़ ने पूछा कौन प्रभु? कृष्ण बोले त्रेता युग का मेरा एक भक्त जो अभी भी गंध मादन पर्वत पर मेरी प्रतीक्षा में बैठा है। हनुमान हनुमान का नाम सुनते ही गरुड़ के चेहरे पर एक उपहास के भाव आए। उन्होंने सोचा वो बूढ़ा वानर राम राम जपने वाला उसके लिए मुझे बुलाया। कृष्ण ने गरुड़ के मन को पढ़ लिया। फिर भी अनजान बनते हुए कहा गरुड़ तुम्हें गंधमादन पर्वत जाना है। हनुमान को आदर सहित यहां लाना है।

लेकिन एक बात का विशेष ध्यान रखना क्या प्रभु? हनुमान से यह मत कहना कि द्वारकाधीश श्री कृष्ण ने बुलाया है। वो शायद ना आए। उसे कहना कि उसके स्वामी धनुर्धारी प्रभु श्री राम ने उसे याद किया है। कहना कि अयोध्यापति राम उसका इंतजार कर रहे हैं। गरुड़ को यह बात अजीब लगी। पर उसने तर्क नहीं किया। उसने सोचा प्रभु भी किस-किस को याद करते रहते हैं। खैर, मुझे क्या? मुझे तो बस जाना है और उस वानर को उठाकर लाना है। गरुड़ ने सिर झुकाया। जैसी आज्ञा प्रभु, मैं अभी जाता हूं और पलक झपकते ही उसे ले आता हूं। यह कहते हुए गरुड़ ने उड़ान भरी। जैसे ही गरुड़ खिड़की से उड़े, उनके मन में एक ही विचार चल रहा था रेसिंग। उन्होंने सोचा गंध मातन यहां से योजनाों दूर है। एक साधारण वानर को आने में महीनों लग जाएंगे। लेकिन मैं मैं उसे अपनी पीठ पर लाद कर लाऊंगा ताकि वह देख सके कि असली गति क्या होती है। आज उस पुराने भक्त को पता चलेगा कि नए युग में भगवान के पास कैसी सुपर सोनिक सवारी है। गरुड़ अपनी पूरी ताकत से हवा को चीरते हुए बादलों को पीछे छोड़ते हुए दक्षिण दिशा की ओर बढ़ रहे थे। उन्हें लग रहा था कि वे शिकार पर निकले हैं। लेकिन उन्हें रत्ती भर भी अंदाजा नहीं था कि वे शिकार करने नहीं बल्कि खुद शिकार होने जा रहे हैं। उन्हें यह नहीं पता था कि जिस वानर को वे केवल एक भक्त समझ रहे हैं वो स्वयं 11वां रुद्र है। वो महाकाल का अंश है और वह गति का दूसरा नाम है। द्वारका से हजारों योजन दूर गंधमादन पर्वत अपनी नैसर्गिक शांति में डूबा हुआ था।

यहां का सन्नाटा भी बोलता था। लेकिन शोर की भाषा में नहीं भक्ति की भाषा में। हवा के हर झोंके में वृक्ष के हर पत्ते के हिलने में एक ही ध्वनि गुंजायमान थी। राम राम राम वहां एक शिला पर एक वानर बैठे थे। शरीर पर वर्षों की जमी धूल, बाल उलझे हुए, आंखें बंद और देह बिल्कुल स्थिर। देखने में वे एक अत्यंत साधारण और बूढ़े वानर लग रहे थे। लेकिन अगर कोई दिव्य दृष्टि से देखता, तो पाता कि उनके रोम रोम से करोड़ों सूर्यों का तेज फूट रहा था। वे महाबली हनुमान थे जो अपने आराध्य के ध्यान में ऐसे लीन थे जैसे सागर अपनी गहराइयों में शांत रहता है। तभी उस परम शांति को भंग करते हुए आकाश से एक भयानक गड़गड़ाहट सुनाई दी। यह बादलों की गर्जना नहीं बल्कि गरुड़ के पंखों का शोर था। गरुड़ अपनी पूर्ण गति और अहंकार के साथ गंध मादन पर उतरे। उनके उतरने का वेग इतना प्रचंड था कि पर्वत की चोटियां कांप उठी। सदियों पुराने वृक्ष जड़ से उखड़ने लगे और ध्यान मग्न पक्षी डर कर उड़ गए। गरुड़ ने जानबूझकर यह शक्ति प्रदर्शन किया था यह दिखाने के लिए कि भगवान का विमान आ गया है। धूल का गुबार जब छटा तो गरुड़ ने देखा कि वह वानर अब भी वैसे ही बैठा है। ना आंखों में हलचल ना चेहरे पर शिकन। गरुड़ का अहंकार चोटिल हो गया। उसने अपने कर्कश और रबीले स्वर में पुकारा। ए वानर आंखें खोल।

मैं द्वारकाधीश श्री कृष्ण का संदेश लाया हूं। उठो। हनुमान जी के कानों तक आवाज तो पहुंची पर राम नाम के अलावा उन्हें कुछ और सुनने में रुचि नहीं थी। वे मौन रहे। गरुड़ का धैर्य जवाब दे गया। उसने और जोर से चिल्लाया, सुनाई नहीं देता। त्रिभुवन के स्वामी ने तुम्हें बुलाया है। इस बार हनुमान जी ने धीरे-धीरे अपनी पलकें उठाई। उनकी आंखों में क्रोध नहीं, असीम, करुणा और गहराई थी। उन्होंने बहुत ही सौम्य स्वर में जैसे कोई बड़ों को समझाता है। कहा, भाई, क्षमा करना। मैं अपने प्रभु राम के नाम में लीन था। तुम जाओ, मैं आता हूं। गरुड़ को यह बात किसी मजाक जैसी लगी। उसने एक व्यंगात्मक हंसी के साथ कहा, तुम आओगे? तुम तो वृद्ध हो चुके हो। वानव। गंधमादन से द्वारका की दूरी तुम्हारे बस की नहीं है। तुम्हें महीनों लग जाएंगे और प्रभु प्रतीक्षा कर रहे हैं। देखो मुझे तुम पर दया आ रही है। मेरी पीठ पर बैठ जाओ। मैं तुम्हें वायु से भी तेज गति से ले चलूंगा। हनुमान जी ने गरुड़ की आंखों में छिपे उस अहंकार को पढ़ लिया। वे मुस्कुराए और बोले, पक्षीराज आप कष्ट ना करें। मेरी गति राम नाम है। जहां राम का बुलावा होता है, वहां पहुंचने में मुझे समय नहीं लगता। आप प्रस्थान करें। मैं आपके पीछे आता हूं। गरुड़ का चेहरा तमतमा गया। एक साधारण वानर ने उसकी सहायता ठुकरा दी। उसने मन ही मन सोचा, मूर्ख वानर, अपनी ज़िद में यह अब पैदल आएगा। इसे आने दो। जब यह हफ्तों बाद पहुंचेगा, तब मैं इसकी हंसी उड़ाऊंगा। गरुड़ ने एक जोरदार हुंकार भरी और आकाश में छलांग लगा दी। उसने अपनी पूरी ताकत झोंक दी। वो हवा को चीरते हुए बादलों को पीछे छोड़ते हुए ऐसे उड़ा जैसे कोई उल्कापड गिरता है। उड़ते हुए उसने एक बार पीछे मुड़कर देखा। वहां मीलों दूर तक केवल खाली आकाश था। हनुमान कहीं नहीं थे। गरुड़ के होठों पर एक विजय की मुस्कान तैर गई।

वो निश्चित हो गया कि उसने उस बूढ़े वानर को बहुत पीछे छोड़ दिया है। उधर द्वारका में श्री कृष्ण ने खेल का अगला पासा फेंका। उन्होंने सुदर्शन चक्र का आह्वान किया। सुदर्शन जो पहले से ही अपने तेज के मद में चूर था, प्रकट हुआ। कृष्ण ने गंभीर स्वर में आदेश दिया। सुदर्शन द्वार पर जाओ और पहरा दो। मेरी आज्ञा के बिना कोई भी मैं दोहराता हूं। कोई भी मेरे कक्ष में प्रवेश ना करें। चाहे वह कोई देवता हो या यक्ष उसे वहीं रोक देना। सुदर्शन प्रसन्न हो गया। उसे लगा आज उसकी शक्ति की असली परीक्षा है। वो द्वारका के मुख्य द्वार पर जाकर स्थापित हो गया। वो अपनी धुरी पर इतनी तेज घूमने लगा कि उसके आसपास की हवा जलने लगी। लाल, नीली और सुनहरी लपटें उससे निकल रही थी। वो साक्षात मृत्यु बनकर द्वार पर खड़ा था। उसी क्षण एक चमत्कार हुआ। गरुड़ अभी रास्ते में ही था। हवा से बातें कर रहा था। लेकिन द्वारका के उस जलते हुए द्वार पर एक सौम्य आकृति प्रकट हुई। बिना किसी शोर के, बिना किसी आंधी के। यह हनुमान जी थे। भक्ति की गति भौतिक गति से हमेशा तीव्र होती है। हनुमान जी मन की गति से वहां पहुंच चुके थे। वे जैसे ही द्वार के भीतर पैर रखने को हुए, उनका रास्ता आग की एक दीवार ने रोक लिया। सुदर्शन चक्र अपने पूर्ण विकराल रूप में सामने था। उसकी गर्मी इतनी थी कि पत्थर भी पिघल जाए। सुदर्शन ने कड़कती आवाज में कहा, रुक जा वानर, आगे बढ़ने का साहस मत करना। मैं सुदर्शन हूं। मुझसे टकराकर काल भी भस्म हो जाता है। लौट जा अन्यथा तेरा अस्तित्व मिट जाएगा। हनुमान जी ने उस जलते हुए चक्र को ऐसे देखा जैसे कोई खिलौने को देखता है। उन्हें अपने प्रभु राम से मिलना था और यह चमकदार पहिया उनके रास्ते में खड़ा था। उन्होंने बहुत ही सहजता से कहा, बालक मुझे मेरे प्रभु से मिलना है। हठ मत करो मार्ग से हट जाओ। बालक सुदर्शन के अहंकार को जैसे किसी ने कुचल दिया हो। क्रोध में आकर सुदर्शन ने अपनी गति और बढ़ा दी और हनुमान जी का सिर काटने के लिए उन पर झपटा। यह हमला इतना घातक था कि ब्रह्मांड का कोई भी कवच इसे नहीं रोक सकता था। लेकिन जो हुआ वह सुदर्शन की कल्पना से परे था। हनुमान जी विचलित नहीं हुए। ना ही उन्होंने कोई गदा उठाई।

जैसे हम हवा में उड़ते किसी मच्छर को पकड़ते हैं या जैसे कोई पिता अपने बच्चे की फेंकी हुई गेंद को लपकता है। ठीक वैसे ही हनुमान जी ने अपना बाया हाथ आगे बढ़ाया। खट एक हल्की सी आवाज हुई। वो सुदर्शन चक्र जो लोकों को जलाने की क्षमता रखता था। हनुमान जी की हथेली और उंगलियों के बीच फड़फड़ा रहा था। हनुमान जी के स्पर्श में राम नाम की शीतलता थी। जिसने सुदर्शन की सारी अग्नि सारा ताप क्षण भर में सौंख लिया। सुदर्शन को लगा जैसे वह बर्फ के पहाड़ से टकरा गया हो। वो छूटने के लिए छटपटाने लगा। लेकिन हनुमान जी की पकड़ वज्र के समान थी। हनुमान जी ने सोचा यह खिलौना बहुत शोर मचा रहा है और प्रभु से मिलने में बाधा डाल रहा है। उन्होंने उसे हथेली में भी और जैसे कोई मीठा पान या जामुन खाता है उसे अपने मुंह में डाल लिया। सुदर्शन चक्र अब हनुमान जी के मुख के भीतर था। वो वहां घूमने की कोशिश कर रहा था। लेकिन हनुमान जी ने उसे अपने मुंह में दबा लिया। वही सुदर्शन चक्र जिसके सामने देवता कांपते थे। अब एक वानर के गाल में सुपारी की तरह दबा पड़ा था। अंधकार में लाचार। कुछ ही क्षणों बाद आकाश में पुनः शोर हुआ। गरुड़ हाफते हुए पसीने से लथपथ द्वारका के प्रांगण में उतरे। लेकिन चेहरे पर जीत की खुशी थी। उन्होंने इधर-उधर देखा द्वार पर कोई नहीं था। सुदर्शन चक्र गायब था। उन्हें लगा कि शायद सुदर्शन किसी कार्यवश हट गया होगा। फिर उन्होंने सोचा वो वानर तो अभी गंध मादन से चला भी नहीं होगा। गरुड़ ने अपनी धूल झाड़ी, अपने पंख सवारे और बड़े गर्व से चलते हुए राज दरबार की ओर बढ़े। यह सुनाने के लिए कि कैसे उन्होंने हनुमान को मीलों पीछे छोड़ दिया है। उन्हें रत्ती भर भी आभास नहीं था कि जिस द्वार रक्षक सुदर्शन को वे अजय मानते थे और जिस वानर को वे तुच्छ समझते थे उन दोनों के बीच क्या घटित हो चुका है। सिंहासन पर द्वारकाधीश श्री कृष्ण विराजमान थे। उनके होठों पर वही रहस्यमय मुस्कान खेल रही थी। तभी गरुड़ राज दरबार में प्रवेश करते हैं। उनका मस्तक गर्व से ऊंचा था। यद्यपि सांसे अभी भी थोड़ी तेज चल रही थी।

उन्होंने आते ही श्री कृष्ण के चरणों में सिर झुकाया और बोले प्रभु कार्य संपन्न हुआ। मैंने आपका संदेश उस वानर को दे दिया है। वो वृद्ध है, धीमा है। उसे आने में अभी बहुत समय लगेगा। परंतु आप चिंता ना करें। मैंने अपना कर्तव्य पूर्ण वेग से निभाया है। श्री कृष्ण ने गरुड़ की आंखों में झांका और धीमे स्वर में कहा। गरुड़ तुम्हारा वेग वास्तव में प्रशंसनीय है। परंतु जरा अपनी गर्दन घुमाकर मेरे सिंहासन के बाई ओर तो देखो। गरुड़ ने जैसे ही गर्दन घुमाई उनके पैरों तले से जमीन खिसक गई। उनकी आंखें फटी की फटी रह गई। वहां प्रभु के चरणों के समीप वही साधारण वानर हनुमान जी बैठे थे। वे आंखें मूंदे बहुत ही मध्यम स्वर में करताल बजाते हुए कीर्तन कर रहे थे। उनके चेहरे पर ना थकान थी, ना पसीना केवल परम शांति थी। गरुड़ का मस्तिष्क शून्य पड़ गया। यह कैसे संभव है? मैं वायुपुत्र हूं। मैं भगवान का वाहन हूं। यह वानर मुझसे पहले कैसे आ सकता है? मैंने तो पीछे मुड़कर देखा था। वहां कोई नहीं था। गरुड़ का वह गगनचुंबी अहंकार पल भर में रेत के महल की तरह ढह गया। उन्हें समझ आ गया कि भौतिक पंखों की गति भक्ति की मनगति के सामने चींटी की चाल समान है। अभी गरुड़ इस सदमे से उभ भी नहीं पाए थे कि श्री कृष्ण ने हनुमान जी की ओर देखा। हनुमान जी कुछ बोल नहीं रहे थे। उनका एक गाल फूला हुआ था जैसे मुंह में कुछ रखा हो। कृष्ण ने विनोद पूर्ण स्वर में पूछा, हनुमान तुम आ तो गए पर कुछ बोल क्यों नहीं रहे और यह मुख में क्या दबा रखा है? क्या मार्ग में कोई फल खा रहे थे? हनुमान जी ने मासूमियत से प्रभु की ओर देखा।

उन्होंने अपनी हथेली आगे की और मुंह से उस वस्तु को थूक दिया। छपाक। एक गीली चिपचिपी और निस्तेज वस्तु फर्श पर आ गिरी। दरबारी और गरुड़ यह देखकर सिहर उठे। वह कोई गुठली नहीं थी। वह स्वयं सुदर्शन चक्र था। वही सुदर्शन जिसकी दीप्ति से आंखें चौंधिया जाती थी। आज वह हनुमान जी की लार में भीगा हुआ फर्श पर पड़ा कांप रहा था। उसका सारा तेज, सारी अग्नि, सारा घमंड हनुमान जी के मुख के भीतर ही बुझ चुका था। वह अब एक साधारण धातु के टुकड़े जैसा लग रहा था। सुदर्शन चक्र को आज अपने अस्तित्व का सबसे कड़वा सत्य पता चला था कि उसकी शक्ति उसका अपना ताप नहीं बल्कि प्रभु की उंगली का स्पर्श है। राम भक्ति के शीतल कुंड में उसका अहंकार बुझ चुका था। दो अहंकार परास्त हो चुके थे। गरुड़ का वेग और सुदर्शन का बल। अब बारी थी तीसरे और सबसे कोमल किंतु सबसे कठोर अहंकार की रूप का अभिमान। श्री कृष्ण ने हनुमान जी से कहा, हनुमान तुम लंबी यात्रा करके आए हो। भूख लगी होगी। रणवास में जाओ। वहां देवी सीता तुम्हें अपने हाथों से भल देंगी। यह सुनते ही हनुमान जी की आंखों में चमक आ गई। माता सीता वे तुरंत उठे और रणवास की ओर दौड़े। उधर सत्यभामा पूरी तैयारी में थी। उन्होंने 16 श्रृंगार किए थे। हीरे मोतियों से लदी हुई थी और सीता जी जैसा वेश बनाकर सिंहासन पर बैठी थी। उन्हें विश्वास था कि हनुमान उन्हें देखते ही माता-माता कहते हुए चरणों में गिर पड़ेंगे और उनकी सुंदरता की स्तुति करेंगे। हनुमान जी कक्ष में प्रवेश करते हैं। उनकी नजर सत्यभामा पर पड़ी। सत्यभामा ने एक मोहक मुस्कान दी। हनुमान जी ने उन्हें ऊपर से नीचे तक देखा। वे एक क्षण रुके। अपनी गर्दन टेढ़ी की और फिर उलझन में पड़ गए। उन्होंने सत्यभामा को प्रणाम तक नहीं किया। बस मुड़कर वापस चल दिए। वे वापस राज दरबार में आए और श्री कृष्ण के सामने खड़े होकर पूरे भरे दरबार में वह प्रश्न पूछा जिसने सत्यभामा के अस्तित्व को झोर कर रख दिया।

हनुमान जी ने अत्यंत भोलेपन से पूछा प्रभु क्षमा करें। आपने तो कहा था वहां माता सीता है पर रणिवास के सिंहासन पर तो कोई दासी बैठी है। उसने माता सीता के वस्त्र और आभूषण जरूर पहन रखे हैं पर वह मेरी माता नहीं हो सकती। मेरी माता सीता कहां है प्रभु? दासी। यह शब्द सत्यभामा के कानों में पिघले हुए शीशे की तरह उतरा। उनका श्रृंगार, उनका रूप, उनका राजसी ठाट बाट सब उस एक शब्द के आगे धूल हो गया। उन्हें एहसास हुआ कि सीता बनने के लिए रेशम नहीं त्याग पहनना पड़ता है। बाहरी सुंदरता से आप विश्व मोहिनी हो सकती हैं पर जग जननी नहीं। सत्यभामा लज्जा से पानीपानी हो गई। तभी रनिवास के दूसरे द्वार से रुक्मिणी बाहर आई। उन्होंने कोई भारी आभूषण नहीं पहना था। केवल एक साधारण साड़ी थी और हाथ में तुलसी दल व जल का पात्र था। पर उनके चेहरे पर सेवा और समर्पण का जो तेज था उसे देखते ही हनुमान जी दौड़कर उनके चरणों में गिर पड़े और गदगद कंठ से बोले प्रणाम माता आपको पहचानने में इस दास को विलंब हो गया। अब दरबार का दृश्य देखने योग्य था। एक ओर गरुड़ सिर झुकाए खड़े थे। फर्श पर निशस्तेज सुदर्शन पड़ा था और द्वार पर लज्जित सत्यभामा खड़ी थी। तीनों के मस्तक झुके हुए थे। तब श्री कृष्ण ने अपना मौन तोड़ा। उनकी वाणी में अब उपदेश की गंभीरता थी। उन्होंने कहा सुदर्शन तुम्हें भ्रम था कि तुम मेरी रक्षा करते हो। याद रखो तुम्हारी शक्ति मेरा धर्म है। तुम नहीं जिस दिन धर्म तुम्हारे साथ नहीं होगा तुम केवल लोहे का एक टुकड़ा हो। गरुड़ तुम्हें अपनी गति पर मान था। तुम्हारी गति मेरी इच्छा है।

तुम्हारे पंख नहीं और सत्यभामा तुम्हें अपने रूप का अभिमान था। स्मरण रहे। सौंदर्य शरीर का नहीं आत्मा का होता है। जहां समर्पण नहीं वहां सुंदरता कुरूपता बन जाती है। कृष्ण ने हनुमान जी के मस्तक पर हाथ रखते हुए अंतिम सत्य कहा। संसार में बलवान, रूपवान और वेगवान बहुत है। लेकिन मेरे पास वही रह सकता है जो हनुमान है। अर्थात जिसमें मान यानी अहंकार का हनन यानी नाश हो चुका हो। जहां राम है वहां काम और अभिमान का कोई स्थान नहीं। हनुमान जी प्रभु का आशीर्वाद लेकर पुनः राम नाम जपते हुए गंधमादन की ओर प्रस्थान कर गए। पीछे छोड़ गए एक शांत और शुद्ध द्वारिका जहां अब सोना नहीं भक्ति चमक रही थी। आज के इस घोर कलयुग में हम सभी के भीतर कहीं ना कहीं एक सुदर्शन, एक गरुण या एक सत्यभामा छिपे बैठे हैं। हम अपनी थोड़ी सी शक्ति यानी पद, थोड़ी सी गति यानी प्रगति या थोड़ी सी सुंदरता पर इतराने लगते हैं। हम भूल जाते हैं कि यह सब क्षणभंगुर है। समय रूपी हनुमान कब हमारे अहंकार के सुदर्शन को निगल जाए और कब हमें आईना दिखा दे, पता नहीं चलता।

 

यह कथा हमें सिखाती है कि जीवन में आप कितने भी ऊंचे क्यों ना उड़ लें। शक्ति का बोझ वही उठा सकता है जो अंदर से झुका हुआ हो। विनम्रता ही सबसे बड़ी शक्ति

 

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